||मेरी परछायीं||

आज मैंने उसे देखा,,
कुछ-कुछ मेरे जैसी!
या फिर शायद हु-ब-हू मेरे जैसी।।

मेरे जैसा रूप, मेरे जैसी चाल..
मेरे जैसी आकृति और वो मेरे जैसे बाल।
मानो हमेशा मेरे साथ ही रहना चाहती थी…
पर जाने क्यूं!
मेरे करीब जाते ही अपना आकार बदलती जाती थी।

कभी इधर , कभी उधर,,
कभी आगे ,तो कभी पीछे…
लगता था जैसे मुझसे लुका-छिपी खेल रही थी।
”तुम अकेली नहीं ,बस बेफिक्र आगे बढ़ो”,
मानो मुझसे बस यही मन ही मन कह रही थी।।

आंसू मेरे गिरते थे, भीग वो जाती थी,
दिल मेरा दुखता था, टूट वो जाती थी।
जरा-सा मुझ पर अन्धकार पड़ते ही,,
बिखर जाती थी जैसे!
मानो कहीं पीछे छूट वो जाती थी।।

हां फिर भी मगर ,
मेरी उन्नति हो या मेरी अवनति,,हरदम वो साथ थी मेरे।
कोई हो न हो , पर वो नज़रों के सामने ,,
या यूं कहूं हर पल वो पास थी मेरे।।

आज मैंने उसे देखा!
अरी मैं ही तो थी वो , ना कोई वो परायी थी।
चलो अब बता ही देती हूं!
कि मेरा साया था ,वो मेरी परछायी थी।।

..ख्वाहिश-ए-नादान..

दिल चाहता है, महज़ इक दिन को सही मगर
मैं तुम्हारे करीब आ सकूँ….
तुम खामोश बैठे रहो!
मैं तुमसे तुम्हारी शिकायतें सुना सकूँ….
तुम नज़रे मिलाने में नाकामयाब रहो!
और मैं जी भर के तुमको निहार सकूँ….
पलकें भीगे तुम्हारी मुझ पर अपने सितम सुन कर!
उन अश्कों में मैं अपने लिए मोहब्बत पा सकूँ….
इतनी शिद्दत से तुम लगाओ गले मुझको!
कि चाह कर भी मैं तुमसे न दूर जा सकूँ….

जब पल आ जाये बिछड़ने का ,तब
तुम थाम के हाथ कह दो कि!
“अब तेरी कमी मैं भी न सह सकूँ”….
दिल चाहता है,महज़ एक दिन को सही मगर!
मैं खुद को तुम्हारी चाहत कह सकूँ||

ये ख्वाहिशें अभी नादान हैं,,
सोचती हूँ, इन्हें नादान ही रहने दूँ||
इन लबों को खामोश कर,,
आँखो को लफ़्ज़ ये कहने दूँ||
जरूरी नहीं कि बयान-ए-मोहब्बत
हर पहर देती रहूँ..
कब तक ख्वाहिशे खुदकुशी करें,,
आखिर कब तक इन्हें ज़हर मैं देती रहूँ||

वो फ़िर लौट के वापस आयी है||

वो वादा मुझे भुलाने का,,
और मुड़ कर कभी ना आने का||

वो उसका भोला-भाला चेहरा
हर पल आँखों पर उसका पहरा||

वो अश्क़ मेरी तन्हायी के,,
उस मासूम की बेवफ़ायी के||

फ़िर मुझे आज़मा रही है,,
करीब वो फ़िर से आ रही है||

बेवफ़ाई ये कैसी निभायी है,,वो
फ़िर लौट के वापस आयी है||

दस्तूर-ए-जहान..

इस दुनिया का यारों यही तो दस्तूर है..
कोई दे दे जवाब गर तो
उसमे बड़ा गुरूर है,
सुन के जो खमोश रहे बस
उसी का सब कसूर है..

इस दुनिया का यारों यही तो दस्तूर है..

कि गलती करने वालो की,
माफ़ी सबको मंजूर है..
बेकुसूर सुन-सुन के ताने
हर ओर, शर्म से चूर हैं..

इस दुनिया का यारों यही तो दस्तूर है..

उस लड़की की इज्ज़त ही नहीं,
वो जो आयी घर से दूर है..
अपनी बेटी कैसी भी हो,
अपनी बेटी हूर है..

इस दुनिया का यारों यही तो दस्तूर है..

आँसू बहा दे जो अपने,
कुछ ज्यादा ही कमजोर है..
जो काबू में रखे आँसू,
बेशर्मी उसका फ़ितूर है..

इस दुनिया का यारों यही तो दस्तूर है..
स्वार्थ के मारे हैं सब, यहाँ सबकी आँखे सूृर हैं..
इस दुनिया का यारों बस यही तो दस्तूर है..